December 13, 2019
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ayodhya verdict latest news: इस सविधान ज्ञानी ने राम मंदिर पर उठाया सवाल, जानिए उनका तर्क क्या कहता है

अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को फैसला सुना दिया. सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया है. लेकिन जिस आधार पर फैसला दिया गया उस पर कानून और संविधान के कुछ जानकार सवाल खड़े कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के वकील और अयोध्या राम टेंपल इन कोर्ट्स किताब के लेखक विराग गुप्ता ने इस फैसले से सहमति जताते हुए कहा कि इस फैसले से एक ऐतिहासिक विसंगति दूर होगी.  पर उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि न्यायिक फैसले पर आलोचकों ने अनेक सवाल उठाए हैं उन पर गौर किया जाना चाहिए.

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वरिष्ठ पत्रकार जे वेंकेटेशन ने भी बीबीसी से बात करते हुए इन सवालों का जिक्र किया आइए उन पांच सवालों पर एक नजर डालते हैं:

 मध्यकाल में सल्तनत और मुगल शासकों ने कई धार्मिक स्थलों को ध्वस्त किया है इस बात के अनेक वृत्तांत हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक विवाद की जड़ उतनी ही पुरानी है जितना भारत का विचार. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संसद से पारित 1991 के कानून का जिक्र किया है. जिसके मुताबिक अयोध्या को छोड़कर बाकी सभी धार्मिक स्थलों में 15 अगस्त 1947 का स्टेटस बरकरार रहेगा.

अयोध्या के अलावा काशी और मथुरा में भी मंदिरों के बीच में बनाई गई मस्जिदों की स्थापना को लेकर विवाद है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संघ परिवार में तो आश्वस्त किया है कि यह बाकी स्थानों पर कोई विवाद शुरू नहीं किया जाएगा। लेकिन देवता को न्याय  एक व्यक्ति और शाखा को मुकदमा दायर करने के अधिकार दिए जाने के बाद अब बाकी जगहों पर तीसरे पक्ष की ओर से मुकदमा शुरू किए जाने की संभावना को कैसे खत्म किया जा सकता है. आर्टिकल 142 और राम मंदिर पर केंद्र सरकार के प्रबंधन से जुड़े भी कुछ सवाल हैं. देश के अधिकांश राज्यों में बड़े मंदिरों के प्रबंधन पर राज्य सरकारों का ही नियंत्रण है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या के राम मंदिर के ट्रस्ट बनाने और प्रबंधन पर इंद्र सरकार का अधिकार होगा जो एक अनोखा मामला होगा। संविधान के मुताबिक भूमि राज्यों का विषय है राष्ट्रपति शासन की वजह से अयोध्या की भूमि का अधिग्रहण केंद्र सरकार ने कानूनी प्रावधानों के तहत किया था. तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बाद हलफनामा देकर अदालत को बताया था कि पुरातत्व विभाग की खुदाई में अगर मंदिर के पक्ष में प्रमाण आए अधिग्रहित भूमि को मंदिर निर्माण के लिए दिया जाएगा।

 सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक पीठ ने अयोध्या भूमि अधिग्रहण कानून की धारा और 7 को वर्ष 1994 के फैसले संवैधानिक करार दिया था लोकसभा चुनावों से पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर करके अधिग्रहित जमीन को वापस करने की मांग की थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हुई. केंद्र और राज्य सरकार इस मामले में पक्षकार नहीं थे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष भी नहीं रखा उसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को मंदिर के ट्रस्ट और मस्जिद के लिए जमीन आवंटित करने का आदेश कैसे दिया।

 मस्जिद के लिए दी जाने वाली 5 एकड़ भूमि कहां होगी इस लेकर भी सवाल किया जा रहा है अदालत ने साफ नहीं किया है. कि वह जमीन कहां होगी मस्जिद के लिए जो जमीन दी जा रही है उसे स्वीकार किया जाए या नहीं इस पर भी सियासत शुरू होने के आसार दिखने लगे हैं एक सवाल यह भी उठ रहा है. कि आमतौर पर अदालतों के फैसले में अलग से कोई नोट नहीं जोड़ा जाता है लेकिन अयोध्या के फैसले में यह नोट जोड़ा गया है। दूसरी तरफ जोड़े गए नोट्स में जिन पांच जो की बेंच ने फैसला सुनाया था। उनमें से किसी का ना तो नाम है और ना ही हस्ताक्षर हैं सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों किया गया? अगर विवादित जमीन पर साल 1949 रखी हुई मूर्ति ही रामलला है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक व्यक्ति माना है. सर्वोच्च अदालत ने उस मूर्ति रखने को अवैध क्यों बताया? इस फैसले के बाद क्या वर्तमान मूर्ति को ही नए बनने वाले राम मंदिर स्थान मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को न्यायिक व्यक्ति माना है, लेकिन जन्म स्थान को न्यायिक व्यक्ति का दर्जा नहीं दिया है. इसके बावजूद जन्मस्थान को ऐतिहासिक मान्यता दिया जाना दिलचस्प है अयोध्या में श्रीराम का जन्म है. इस पर कभी विवाद नहीं रहा लेकिन जो विवाद जमीन है वही जन्म था इस बिंदु पर फैसले में आस्था और साक्ष्यों के घालमेल के आरोप लग रहे हैं. 

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